(यह एक यात्रा वृतांत है। जिसे लिखा है सुरेंद्र विश्वकर्मा ने। वह अपने किस्म के अद्भुत यायावर हैं। यात्राएं तो बहुत लोग करते हैं। लेकिन शायद ही उनके जैसा कोई करता हो। आम तौर पर लोग पूरी व्यवस्था से जाते हैं। उनके पास होटल पहले से बुक होता है। कहां ठहरना है और भोजन की क्या व्यवस्था होगी सभी चीजों का पहले से इंतजाम होता है। यहां तक कि किन स्थानों को देखना है और कहां कितना दिन बिताना है सब कुछ पहले से तय होता है। लेकिन सुरेंद्र विश्वकर्मा यात्रा पर जाने से पहले ऐसा कुछ नहीं करते हैं। वह खुद को अकेले गंतव्य के रास्ते में छोड़ देते हैं और फिर लोग उन्हें संभालते हैं। रास्ते में पड़ने वाले स्थानीय लोगों के घर ही उनका ठिकाना होते हैं और उनकी हर संभव कोशिश होती है कि उन्हीं के घर उनके साथ खाना-नाश्ता किया जाए। और फिर स्थानीय लोगों से बात करते और उनकी संस्कृति और रहन-सहन को समझते हुए वो गंतव्य की तरफ प्रस्थान करते हैं। इस तरह से गंतव्य उनके लिए सेकेंडरी हो जाता है और लोगों के साथ बिताए पल प्राथमिक। लिहाजा जहां भी जाते हैं वहां से वह अनुभवों और ज्ञान का खजाना लेकर लौटते हैं। जो न केवल उनको समृद्ध करता है बल्कि उसको साझा करके वह दूसरों को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन्हीं यात्राओं की कड़ी में उन्होंने एक संस्मरणात्मक किताब लिख डाली है। जिसका शीर्षक है ‘ज़िंदगी क्या है सफर की बात’। जनचौक ने उनकी यात्राओं से जुड़े संस्मरण पर आधारित कुछ लेख पोर्टल पर प्रकाशित करने का फैसला किया है। पेश है उसकी पहली कड़ी-संपादक)
मैं हाफलांग हूँ। मेरे नाम पर न जाइये, क्योंकि इसे किसने रखा कोई ठीक – ठीक नहीं बता पाता, अंग्रेज अपना दावा ठोकते – ठोकते बेदम हुए तो दिमासा साम्राज्य हाथ की लकीरों की तरह इतिहास हो गए! इसी तरह मेरे बसने की कहानी भी इतनी उलझी हुई है कि मैं इसे शुरू से बयान न करूं तो इसकी बारीकियां किसी को समझ में न आएंगी।

बात असम में चाय और कोयले के अंग्रेजी खोज से जुड़ी हुई है। उन दिनों डिब्रूगढ़ से कलकत्ता बन्दरगाह तक पहुंचने में दो हफ्ते का समय लगता था, लेकिन अंग्रेजों के नाक के बाल बने जनेऊधारी बंगालियों ने जतिंगा गांव के पहाड़ी इलाके से होकर कलकत्ता की जगह चटगांव बन्दरगाह तक का एक नया रास्ता अंग्रेजों को सुझा दिया, उसी समय से मेरे और मेरे जनजातीय राजाओं, जिनकी राजधानी माइबांग से दीमापुर के बीच डोलती रहती थी का दुर्भाग्य शुरू हो गया।

बादलों से अठखेलियाँ खेलती घने जंगलों से लकदक मेरे पहाड़ की प्राकृतिक खूबसूरती गोरों को भाई कि उन्होंने यहाँ अपना ऐशगाह बना लिया। जो जितना बड़ा तगमाधारी था, उसने उतने ही बड़े इलाके को बंजर कर दिया। स्कूल खुले, कॉलेज खुले, मसीही दरबार के साथ दवा दारू का भी इंतजाम हुआ, लेकिन क्या मजाल कि उसमें मूल निवासियों को तो छोड़िए यहां तक का रास्ता दिखाने वाले बंगाली भी न ढुक सके।

ब्रह्मपुत्र घाटी के प्राकृतिक असबाब को तेजी के साथ चटगाँव बन्दरगाह तक पहुँचाने के लिए अब हाथियों की जगह रेलगाड़ी की ज़रूरत आन पड़ी, लिहाजा सात समुन्दर पार बैठी महारानी ने रेलगाड़ी के लिए पटरी बिछाने का फरमान जारी कर दिया और सोलह साल में जंगलों और पहाड़ियों को काट-काट कर 1904 में मीटर गेज वाली रेलगाड़ी दौड़ गई। रास्ते के लगभग बीच में मैं पड़ता था तो कुछ समझदार लोगों ने नाम रख दिया हाफलांग, लेकिन उनसे भी समझदार कहते हैं कि मेरा नाम लाल चीटियों के कारण पड़ा, परंतु बड़ी – बड़ी लाल चीटियां तो इस इलाके में सब जगह पायी जाती हैं जिसकी चटनी सर्दी, खांसी और बुखार में सदियों से प्रयोग होती आ रही थी।
कहते हैं कि हाथ की रेखाएं, देशों की सीमाएं और दरिया का रुख न बदले क्या इसकी कोई गारंटी दे सकता है? तो जनाब, ब्रिटिश झंडे का फंदा खोलने, लाठी टेकते गांधी 1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान मेरे दर से होकर गुजर गए। हुजूर मेरे दर पर इसलिए नहीं रुके, क्योंकि मैं तो हुक्मरानों का गढ़ था और बकिया सात समुन्दर पार बैठी महारानी के घाघरे का नाड़ा बने हुए थे, लिहाजा गांधी जी सिलचर रुके। खैर, सैंतालिस में झंडा बदल गया, लेकिन डंडा वही रहा, जिसके कारण समूचे ब्रह्मपुत्र घाटी को आरे से काट – काट कर प्लाईवुड बनाया गया अब मेरे इलाके की बारी है।

बहरहाल, अब यात्रा की बात करते हैं …
घने जंगलों से लकदक पहाड़ियों, बेशुमार नदी – नालों – झरनों और सुरंगों को गुलजार करती दयांग घाटी की लगभग 100 किलोमीटर के माइबांग से बदरपुर का रेल सफर, हिन्दुस्तान का सबसे बेजोड़ और खूबसूरत रेलखण्ड की यात्रा है। यूट्यूब पर आपको इस यात्रा से सम्बंधित बहुत सारे वीडियो मिल जाएंगे, इसलिए जायजा लेते हैं इलाके के रहन – सहन के बारे में ..

समाज में महिलाओं का वर्चस्व है। घर – दुकान से लेकर बच्चों को वही संभालती हैं, पुरुष बिल्कुल बोका की तरह लगते हैं। घाटियों में धान के खेत हैं, जिसे बैल की जगह भैंस जोतती हैं और उनकी सींघ बहुत लंबी – लम्बी होती हैं। केला और बांस तो यहां घास – फूस की तरह उगता है। पके केले का स्वाद बेजोड़ है तो बॉस के कोपलों की सब्जी भी कुछ कम नहीं। भाई अगर आपने यहां का अनानास नहीं खाया तो फिर क्या खाया?

पहले इसकी खुशबू मुँह में पानी ला देती है फिर इतना मीठा और रसदार कि भरपेट खाये बिना रहा न जाये और सबसे खास बात यह है कि दांत बिलकुल भी खट्टा नहीं होता है। इसके अलावा हनुमान नदारद हैं तो युधिष्ठिर के घराती कुकुर महाराज को सदारत हुये न जाने कितनी सदियां गुजर गईं। बाघ और भालू तो अंग्रेजों के गोली के शिकार हुए और गजराज को नागाओं ने उदरस्थ कर लिया, बचे परिंदे तो वह अपनी जान बचाने के लिए भागते फिरते हैं। हां, रसोई घर में पाए जाने वाले छोटे तिलचट्टे तो बाजार में तौल कर सूखी मछलियों की तरह बिकते हैं और रही बात गाय के मांस की तो लोग बड़े चाव से खाते हैं।
बहुत बयान बाजी हुई, अब बन्द करते हैं।